आज़ादी के बाद पहली बार चुनावी प्रक्रिया में हुआ बड़ा बदलाव

जानें जम्मू-कश्मीर में कौन वोट डाल सकता है?

 
For the first time after independence, there was a big change in the electoral process

परिसीमन के बाद जम्मू कश्मीर में चुनाव होंगे ये तो सभी जानते थे। लेकिन अब चर्चा है कि चुनाव में ऐसे लोग भी वोट देंगे जो आज से पहले पात्र नहीं थे, अब होंगे। ये जानकारी आते ही घाटी के नेताओं ने हाय तौबा मचाना शुरू कर दिया कि केंद्र ने तो जम्मू कश्मीर की डेमोग्राफी ही बदल दी।

जम्मू कश्मीर में कुछ बड़ा बदलाव होने वाला है। 370 हटाने जितना बड़ा तो नहीं लेकिन ऐसा कुछ जिससे पूरे राज्य में हलचल मच गई है और आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति के अलावा किस्म किस्म की बातें हो रही हैं।

परिसीमन के बाद जम्मू कश्मीर में चुनाव होंगे ये तो सभी जानते थे। लेकिन अब चर्चा है  कि चुनाव में ऐसे लोग भी वोट देंगे जो आज से पहले पात्र नहीं थे और अब होंगे। ये जानकारी आते ही घाटी के नेताओं ने हाय तौबा मचाना शुरू कर दिया कि केंद्र ने तो जम्मू कश्मीर की डेमोग्राफी ही बदल दी।

जबकि दूसरा पक्ष ये कह रहा है कि दो 75 साल में नहीं हो पाया वो हमने कर दिखाया। सत्य इन दोनों के बीच में है। इसी को लेकर आज चर्चा करेंगे। 

चुनाव में एक वोट की कीमत भी होती है। ऐसे में अगर आपको कहे कि किसी चुनाव में एकमुश्त 20-25 लाख वोटर बढ़ गए हैं। ये इतना बड़ा आंकड़ा है जिससे कि किसी भी चुनाव के गणित पर प्रभाव पड़ सकता है।

18 अगस्त की सुबह जम्मू कश्मीर के मुख्य चुनाव अधिकारी हिरदेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बताया कि जम्मू कश्मीर की नई विधानसभा के लिए जो चुनाव होंगे उसमें वोटरों की संख्या बढ़ने वाली है। अनुच्छेद 370 और 35ए के निष्प्रभावी होने का बड़ा प्रभाव चुनाव पर पड़ने वाला है।

जम्मू-कश्मीर के मुख्य निर्वाचन अधिकारी हिरदेश कुमार बताया था कि जम्मू एवं कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद-370 के अधिकतर प्रावधानों को निरस्त करने के बाद मतदाता सूची का विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण किया जा रहा है।

केंद्र शासित प्रदेश में करीब 25 लाख नए मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में दर्ज होने की उम्मीद है। मुख्य चुनाव अधिकारी हिरदेश कुमार ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में रहने वाले या काम करने वाले गैर-स्थानीय लोगों सहित कोई भी भारतीय नागरिक, मतदान सूची में अपना नाम सूचीबद्ध कर सकता है और केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों में वोट डाल सकता है।

कुमार का कहना है कि जम्मू-कश्मीर के पीस स्टेशंस में तैनात सशस्त्र बल के जवान भी अपना नाम मतदाता सूची में जोड़ सकते हैं। 

कौन बन सकता है वोटर

मुख्य चुनाव अधिकारी हिरदेश कुमार का कहना है कि जम्मू कश्मीर में इस बार करीब 25 लाख नए बेटरों का नाम वोटर लिस्ट में शामिल होने की उम्मीद है।

उन्होंने कहा कि कर्मचारी, छात्र, मजदूर और कोई भी गैर स्थानीय जो कश्मीर में रह रहा है, वह अपना नाम वोटर लिस्ट में शामिल करा सकता है, जहां उसे इसके लिए स्थानीय निवास प्रमाण पत्र की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। 

क्या कहता है संविधान

चुनाव अधिकारियों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में पांच अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद जनप्रतिनिधिन अधिनियम 1950 और 1951 प्रभावी होता है।

यह कानून यहां रहने वाले हर व्यक्ति को केंद्र शासित जम्मू-कश्मीर को मतदाता सूची में पंजीकृत होने की अनुमति देता है।

बशर्ते कि उसका नाम उसके मूल निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची से हटा दिया जाए। अधिकारियों का कहना है कि संवैधानिक तरीके से देश का कोई भी नागरिक किसी भी राज्य का वोटर बन सकता है। 

पहले क्या थी स्थिति ? 

ये ऐसे वोटर होंगे जो लंबे समय से जम्मू कश्मीर में रहते तो थे लेकिन मूल निवासी न होने की वजह से उन्हें राज्य के विधानसभा चुनाव में वोटिंग का अधिकार नहीं था। इसमें एक बड़ा तबका पाकिस्तान विभाजन के वक्त सियालकोट और तमाम दूसरे इलाकों से आए थे।

उनकी संख्या करीब 30 हजार के आसपास बताई जाती है। एक बड़ा तबका वाल्मिकी समाज के लोगों का भी है जो 60 के दशक से जम्मू कश्मीर में रहते हैं। साल 1957 में सफाई कर्मियों की जम्मू कश्मीर में बड़ी हड़ताल हुई।

राज्य में सफाई को लेकर अव्यवस्था हुई तो पंजाब से मदद मांगी गई। तब अमृतसर और गुरदासपुर से 272 सफाई कर्मियों को लाया गया, रहने के लिए मकान दिए गए। पर्मानेंट रेजिडेंस सर्टिफिकेट देने का वादा किया गया। लेकिन वो दर्जा कभी मिला ही नहीं।

अनुच्छेद 370 और 35ए की आड़ लेकर राज्य की मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश कभी हुई ही नहीं। अधिकारियों का कहना है कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति से पहले में यहां रहने वाले गैर कश्मीरी लोग मतदाता सूची में पंजीकृत होने के पात्र थे।

उन्हें गैर स्थायी निवासी (एनपीआर) मतदाताओं के रूप में क्लासिफाइड किया गया था। पिछले संसदीय चुनावों के समय जम्मू-कश्मीर में ऐसे करीब 32,000 मतदाता थे।

कब शुरू होगी प्रक्रिया 

10 नवंबर तक दावों और आपत्तियों का निपटारा किए जाने की समय सीमा रखी गई है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार जम्मू-कश्मीर में फिलहाल 98 लाख लोग 18 वर्ष से अधिक आयु के हैं, लेकिन मतदाता सूची में सिर्फ 76 लाख लोग ही शामिल हैं।

ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि इस बार मतदाता सूची में बड़ी संख्या में नए नाम दर्ज होंगे। 

भाजपा के खिलाफ एकजुट हुए जम्मू-कश्मीर के तमाम राजनीतिक दल

जम्मू-कश्मीर की संशोधित मतदाता सूची में ‘‘गैर-स्थानीय मतदाताओं को शामिल करने’’ के मुद्दे पर नेशनल कॉन्फ्रेंस द्वारा सर्वदलीय बैठक बुलाई गई।

उच्च सुरक्षा वाले गुपकर इलाके में नेकां अध्यक्ष फारुख अब्दुल्ला के आवास पर बैठक हुई। इसमें नेकां नेताओं के अलावा पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की प्रमुख महबूबा मुफ्ती, कांग्रेस की जम्मू-कश्मीर इकाई के अध्यक्ष विकार रसूल, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेता एम. वाई. तारिगामी और शिवसेना के नेताओं ने हिस्सा लिया। 

नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम डॉ फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि हम सितंबर में सभी राष्ट्रीय दलों के नेताओं को जम्मू-कश्मीर में आमंत्रित करेंगे और अपने मुद्दों को उनके सामने रखेंगे। 

पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के प्रमुख सज्जाद लोन ने कहा कि जम्मू-कश्मीर की संशोधित मतदाता सूची में गैर-स्थानीय लोगा को मतदाता के तौर पर शामिल करने के मुद्दे पर उनकी पार्टी प्रदर्शन और भूख हड़ताल करेगी।

लोन ने इस मुद्दे पर नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) द्वारा सोमवार को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में शामिल नहीं होने का फैसला करते हुए कहा कि बैठक बुलाने का फैसला गंभीरता से लिया गया होता, तो इसका मीडिया में बखान नहीं किया जाता।

लोन की पीपुल्स कॉन्फ्रेंस ने 2018 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से गठबंधन तोड़ लिया था। उन्होंने पत्रकारों से कहा, ‘‘ हम एक अक्टूबर तक इंतजार करेंगे, जब तक कि मतदाता सूची का मसौदा प्रकाशित नहीं हो जाता।

भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष रविंदर रैना ने भी त्रिकुटा नगर में पार्टी मुख्यालय में पार्टी के शीर्ष नेताओं की एक बैठक बुलाई।

बैठक का एजेंडा फारूक अब्दुल्ला और अन्य द्वारा श्रीनगर में बुलाई गई सर्वदलीय बैठक के खिलाफ जवाबी रणनीति तैयार करना था।

विशेष रूप से चुनाव आयोग ने 17 अगस्त को जम्मू और कश्मीर में विशेष सारांश संशोधन के कार्यक्रम की घोषणा की और घोषणा की कि जो लोग क्षेत्र से अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद विधानसभा में मतदाता नहीं थे, उनका नाम अब मतदाता सूची में रखा जा सकता है।