गुजरात चुनाव में 'परिवारवाद की राजनीति' से कोई भी दल नहीं बच पाया

 
No party could escape from 'family politics' in Gujarat elections

भारतीय राजनीति में परिवारवाद जैसी बुराई के प्रति समाज में जागरूकता आने का ही परिणाम है कि कुछ हद तक इस समस्या पर काबू पाया गया है लेकिन पूरी तरह इसके खत्म होने में अभी लंबा समय लगेगा।

राजनीति में परिवारवाद एक बड़ी बुराई है और भाजपा इसके खिलाफ आक्रामकता से लड़ती रही है। लेकिन गुजरात विधानसभा चुनावों के लिए विभिन्न दलों की ओर से उतारे गये उम्मीदवारों के नामों पर गौर करें तो वह कहावत याद आ जाती है कि हाथी के दांत दिखाने के कुछ और होते हैं और खाने के कुछ और।

देखा जाये तो वंशवाद एक ऐसी परम्परा भी बन चुकी है जिसे हर चुनाव में निभाया जाता है क्योंकि सभी राजनीतिक दलों की पहली प्राथमिकता यही होती है कि चुनाव जीतने की क्षमता रखने वाले को उम्मीदवार बनाया जाये भले ही वह किसी भी पृष्ठभूमि का क्यों ना हो।

गुजरात में भाजपा उम्मीदवारों के नामों पर गौर करें तो पार्टी ने 182 सीटों में से 7 सीटों पर मौजूदा या पूर्व विधायकों के बेटों को उम्मीदवार बनाया है तो वहीं कांग्रेस ने 13 सीटों पर विधायकों अथवा पूर्व विधायकों के बेटों को टिकट दिया है।

गुजरात में नेता-पुत्रों को मिले टिकटों के कारणों पर गौर करेंगे तो यही प्रतीत होगा कि उनकी जीत की प्रबल क्षमता के चलते ही उन्हें उम्मीदवार बनाया गया है। उम्मीदवारों की सूची दर्शाती है कि जिन इलाकों में उम्मीदवार अपने पिता के दबदबे के चलते अपने प्रतिद्वंद्वी पर भारी पड़ते दिखे, उन इलाकों में नेता-पुत्रों को उतारना राजनीतिक दलों की मजबूरी दिखी।

कुछ नेता-पुत्रों के नामों पर गौर करेंगे तो सारी स्थिति स्पष्ट हो जायेगी। जैसे- आदिवासी नेता और 10 बार के कांग्रेस विधायक मोहन सिंह राठवा की ओर से कांग्रेस पार्टी के साथ अपने दशकों पुराने संबंध तोड़ने और पिछले महीने भाजपा में शामिल होने का फायदा उनके बेटे को मिला है।

भाजपा ने उनके बेटे राजेंद्र सिंह राठवा को छोटा उदेपुर सीट से टिकट दिया है। अब अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित इस सीट पर राजेंद्र सिंह राठवा और पूर्व रेल मंत्री नारन राठवा के बेटे एवं कांग्रेस नेता संग्राम सिंह राठवा के बीच सीधा मुकाबला होगा।

इसके अलावा, अहमदाबाद जिले की साणंद सीट से मौजूदा विधायक कानू पटेल कांग्रेस के पूर्व विधायक करण सिंह पटेल के बेटे हैं। करण सिंह पार्टी छोड़कर 2017 में भाजपा में शामिल हो गए थे। भाजपा ने एक बार फिर उनके बेटे कानू पटेल को इस सीट से टिकट दिया है।

वहीं थसरा विधानसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार योगेंद्र परमार दो बार विधायक रहे राम सिंह परमार के बेटे हैं। राम सिंह परमार ने 2017 में कांग्रेस छोड़ने से पहले 2007 और 2012 में पार्टी की टिकट पर जीत हासिल की थी, लेकिन बतौर भाजपा उम्मीदवार उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। इसलिए भाजपा ने अब उनके बेटे योगेंद्र परमार को मौका दिया है।

दूसरी ओर, अहमदाबाद की दानिलिम्दा सीट से दो बार के कांग्रेस विधायक शैलेश परमार पूर्व विधायक मनु भाई परमार के बेटे हैं। कांग्रेस ने एक बार फिर शैलेश परमार पर भरोसा जताया है। अन्य उदाहरणों को देखें तो पाएंगे कि गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला के बेटे और दो बार विधायक रहे महेंद्र सिंह वाघेला भी इस बार बायद सीट से मैदान में हैं।

हम आपको बता दें कि महेंद्र सिंह वाघेला पिछले महीने एक बार फिर कांग्रेस में शामिल हो गए थे। महेंद्र सिंह वाघेला ने साल 2012 और 2017 के बीच कांग्रेस विधायक के रूप में बायद निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था। 2019 में वह भाजपा में शामिल हो गए थे हालांकि पिछले महीने वह फिर कांग्रेस में लौट आए।

इसी तरह, गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री अमर सिंह चौधरी के बेटे तुषार चौधरी को कांग्रेस ने अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट बारदोली से टिकट दिया है। तुषार चौधरी 2004-09 के बीच मांडवी से लोकसभा सांसद और 2009 से 2014 तक बारदोली के सांसद रह चुके हैं।

वहीं, पोरबंदर सीट से भाजपा के पूर्व सांसद (दिवंगत) विट्ठल रादडिया के बेटे जयेश रादडिया ने धोराजी विधानसभा सीट से 2009 का उपचुनाव जीता था। उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में जेतपुर निर्वाचन क्षेत्र से 2012 का विधानसभा चुनाव जीता।

जयेश रादडिया और उनके पिता विट्ठल रादडिया ने 2013 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। बाद में जयेश रादडिया ने 2017 में भाजपा के टिकट पर जेतपुर से चुनाव जीता था। इसके बाद वह विजय रूपाणी के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री भी रहे। भाजपा ने इस बार फिर उन्हें जेतपुर से टिकट दिया है।

बहरहाल, देखा जाये तो सभी राजनीतिक दलों में कई परिवार ऐसे हैं जो राजनीति को अपनी विरासत मानते हैं। ऐसे परिवार अपनी-अपनी सीट पर काफी प्रभाव डालते हैं और चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।

सभी राजनीतिक दल ऐसे नेताओं का कोई विकल्प नहीं ढूंढ़ पा रहे हैं और इसलिए वे उनके करीबियों को टिकट देने को मजबूर हैं। इसके अलावा कुछ जगह ऐसे कई दबंग नेता भी देखने को मिल जाते हैं जिनके सामने उनके राजनीतिक दलों का कोई अन्य नेता या कार्यकर्ता चुनाव में खड़ा होने की हिम्मत ही नहीं कर पात।

इस तरह हर बार चुनावी टिकट दबंगों या उनके परिवार के सदस्यों को मिलता रहता है। खैर...राजनीति में परिवारवाद जैसी बुराई के प्रति समाज में जागरूकता आने का ही परिणाम है कि कुछ हद तक इस समस्या पर काबू पाया गया है लेकिन पूरी तरह इसके खत्म होने में अभी लंबा समय लगेगा।

साभार - गौतम मोरारका

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