Turtles in Ganga: आखिर क्यों छोड़े जा रहे हैं गंगा नदी में एक हजार कछुए, जानिये इसकी वजह

 
Turtles in Ganga: Why are one thousand turtles being released in the river Ganga, know the reason
गंगा नदी के पानी की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ है। नमामि गंगे कार्यक्रम के संयोजक ने कहा कि इसमें कछुओं की बड़ी भूमिका रही है। कछुए नदी में फेंके गए मांस और अपशिष्ट उत्पादों को खाकर पानी करे साफ रखते हैं। आखिर में गंगा एक्शन प्लान के तहत कछुओं के प्रजनन व पुनर्वास केंद्र ने 1980 से अब तक 40,000 से अधिक कछुए पवित्र नदी में छोड़े हैं।

Turtles in Ganga: केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार गंगा नदी समेत तमाम नदियों के पानी को स्‍वच्‍छ व निर्मला बनाने के प्रयास में जुटी है। इसी कड़ी में अब गंगा नदी को स्वच्छ और पुनर्जीवित करने के अपने प्रयासों के तहत केंद्र सरकार अगले दो महीने के भीतर उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में सैकड़ों कछुए पवित्र नदी में छोड़ेगी।

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वाराणसी में भारत के पहले कछुओं के प्रजनन व पुनर्वास केंद्रों में से एक में पैदा होने वाले कछुओं से गंगा की स्वच्छता में सुधार होगा। नमामि गंगे कार्यक्रम, वन व वन्यजीव विभाग और भारतीय वन्यजीव संस्थान कछुओं को गंगा नदी में छोड़ने के कार्यक्रम में शामिल हैं।

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दरअसल, अधजले शवों, सड़े-गले मांस और फेंके गई फूल मालाओं के कारण गंगा नदी प्रदूषित होती रही है। कछुआ पुनर्वास केंद्र में काम करने वाले डब्ल्यूआईआई के जीवविज्ञानी आशीष पांडा ने बताया कि गंगा नदी में 2017 से करीब 5,00 कछए छोड़े जा चुके हैं। उन्‍होंने बताया कि 2017 से अब तक करीब 5,000 कछुए छोड़े जा चुके हैं। इस साल भी 1,000 कछुए छोड़े जाएंगे।

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कछओं को नदी में छोड़ने का मकसद गंगा की स्वच्छता को मजबूत करना है। 1980 के दशक के आखिर में गंगा एक्शन प्लान के तहत केंद्र ने अब तक 40,000 से अधिक कछुए नदी में छोड़े हैं। गंगा एक्‍शन प्‍लान के पहले चरण में करीब 28,000 कछुए छोड़े गए थे।

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केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने 2014 में प्रदूषण उन्मूलन और नदी संरक्षण व पुनर्जीवन के दोहरे उद्देश्यों को पूरा करने के लिए एक प्रमुख पहल नमामि गंगे कार्यक्रम शुरू किया था। इसके बाद केंद्र ने इस तरफ नए सिरे से ध्यान देना शुरू किया।

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वाइल्‍ड लाइफ इंस्‍टीट्यूट ऑफ इंडिया ने और वन विभाग ने 2017 से अंडे से निकले कछुओं को मुक्त करने के अपने प्रयासों को नवीनीकृत किया। कछुओं के प्रजनन व पुनर्वास केंद्रों में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह की लगभग एक दर्जन प्रजातियों का पालन-पोषण किया जाता है।

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वन व वन्यजीव विभाग की टीम चंबल क्षेत्र के तटीय इलाकों से कछुओं के अंडे लेकर आती है। कछुए के अंडों की 70 दिन तक निगरानी की जाती है। इसके लिए उनको ऐसे कमरे में रखा जाता है, जो अंडे सेने के अनुकूल होता है।

जमीन में पानी भरने और ऊपर ईंटें रखने के बाद अंडों को लकड़ी के बक्सों में रेत के अंदर दबा दिया जाता है। एक डिब्बे में केवल 30 अंडे रखे जाते हैं। जून और जुलाई के बीच 27 से 30 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर अंडे सेने का काम पूरा किया जाता है।

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इसके बाद नदी में छोड़े जाने से पहले दो साल तक एक कृत्रिम तालाब में कछुओं की निगरानी की जाती है। नमामि गंगे कार्यक्रम के संयोजक का कहना है कि गंगा नदी को साफ करने में कछुओं की बड़ी भूमिका रही है। कछुए नदी में फेंके गए मांस और अपशिष्ट पदार्थों को खा लेते हैं।